भोपतपुर की ये सच्चाई पहले नहीं सुनी होगी आपने!

जिला मुख्यालय से करीब 42 किलोमीटर दूर गंगा नदी के किनारे बसा भोपतपुर गाँव यूँ तो कभी चर्चाओं में नही रहता। लेकिन बीजेपी सांसद डॉ0 भोलासिंह ने जब आदर्श ग्राम योजना के तहत इस गाँव को गोद लिया तो इसकी चर्चा जिला मुख्यालय से लेकर लखनऊ और दिल्ली तक होने लगी है।

जिले के बड़े अफसरान से लेकर मेरठ और लखनऊ के अधिकारी भी इस गाँव में विकास की गंगा बहाने के लिए तत्पर है। लेकिन सवाल यह है कि बरसों से तमाम समस्याओं से जूझ रहे इस गाँव को संजीवनी देने के लिए कोई रणनीति अभी तक क्यों नही बनी।

भोपतपुर ग्राम की वर्तमान प्रधान श्रीमती रेनू सिंह बताती है कि जब उन्होने यहाँ की प्रधानी सम्हाली, सैकड़ो जनसमस्याओं से बेजार इस गाँव की जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। ग्रामप्रधान के अधिकार क्षेत्र के तहत आने वाली सभी कोशिशें उनके द्वारा की गयी। लेकिन सड़क, बिजली, पानी, पेयजल और शिक्षा की दुश्वारियों से जूझ रहे इस गाँव में विकास की गति बेहद धीमी रही।

जिला मुख्यालय से दूसरे छोर पर होने के कारण महीनों-महीने इस गाँव में अफसरों की आमद तक नही हुई। समस्याओं को अपनी नियति मान चुके गाँववालों को सांसद डॉ0 भोलासिंह से बहुत उम्मीदें है। वक्त बतायेगा कि गाँव में विकास की गंगा उतारने के लिए भागीरथ बने भोलासिंह जमीनी विकास करने में सफल होते है या नेताओं के थोथे वायदों की तरह उनका यह गाँव केवल कागजी विकास करेगा।

सड़क, बिजली और पेयजल

इस गाँव की आबादी मजरा भोपतपुर समेत करीब 5 हजार है। सड़क के नाम पर पूरे गाँव की मुख्य सड़के और गलियां केवल ईटों के खरंजों से जुड़ती है। बरसात के दिन इस गाँव के लोगो के लिए नरक से भी बदतर हो जाते है जब पूरे इलाकी सिल्ट इस खरंजों पर होती है और रास्ते और नालियों में फर्क करना नामुमकिन हो जाता है।

ग्रामीण परमसिंह कहते है कि बच्चे और महिलाऐं और बड़े-बुजुर्ग तो इन दिनों में घरों से निकलना बंद कर देते है। भोपतपुर ग्राम को मजरा भोपतपुर (इसी ग्रामसभा का छोटा गाँव) के बीच तलवार रजवाहा है। लेकिन आजादी के बाद से आज तक यहाँ इस रजवाहे को पार करने के लिए छोटे से पुल की व्यवस्था तक नही हो सकी है। गाँव के लोग पानी में होकर रास्ता पार करके दूसरे गाँव तक पहुँचते है।

बिजली की समस्या जिले के दूसरों गाँव की तरह ही है। यहाँ आपूर्ति की समस्या के अलावा गाँव का अधूरा विद्युतीकरण बड़ी है। पूरे गाँव में कहीं स्ट्रील लाइट नही है। इसके अलावा गाँव के बीच से गुजर रही हाईटैंशन बिजली लाइन गाँववालों के लिए हमेशा खतरा बनी रहती है।

छह महीने पहले हाइटेंशन लाइन गिरने से हुए हादसे में दो छोटी बच्चियों में से एक की मौत हो गयी थी और दूसरी बुरी तरह झुलस गयी थी। आज इस बच्ची का जीवन परेशानियों से घिरा हुआ है। पूरे गाँव में जब अधूरा विद्युतीकरण हुआ तभी के तार लगे हुए है और आज तक नही बदले गये है।

पूरा गाँव पेयजल की समस्या से ग्रसित है। इतनी बड़ी आबादी में केवल 20 सरकारी हैंडपंप है। बाकी लोग खुद के अपने हैंडपंपों से पानी लेकर अपना काम चलाते है। लेकिन अप्रमाणिक हैंडपंपों में पीने का पानी दूषित होने की वजह से गाँव के लोग पेट संबधी विकारों से ग्रसित रहते है। इसके अलावा गाँव की नालियों में जलनिकासी सामान्य न होना भी बड़ी दिक्कत है। इसके अलावा दलित बस्ती और पंचायतघर पर हैंडपंप भी नही है।

स्कूल के अभाव से जूझता गाँव

शिक्षा के साधनों में इस गाँव में केवल एक जूनियर हाईस्कूल और दो प्राइमरी पाठशालाऐं है। आठवीं कक्षा के बाद की पढ़ाई के लिए बच्चों को गाँव से बाहर जाना पड़ता है। ऐसे में गरीब परिवारों की बेटियां शिक्षा से महरूम रह जाती है। कालेज और डिग्री कालेज इस गाँव से 10 किलोमीटर दूर अनूपशहर और 13 किलोमीटर दूर डिबाई में स्थित है। लेकिन यहाँ गाँव के बच्चों का एडमीशन कराना अपने आप में बड़ी कवायद होती है।

जनसुविधाऐं मयस्सर नही

गाँव में दो तालाब है। जो तालाब गाँव में है उसमें पानी बहुत गंदा है। पूरे गाँव के घरों का गंदा पानी इसी गाँव में इकठ्ठा होता है जो आबादी के लिए मच्छरों और कीड़ों की फसल पैदा करता है। ग्रामीण होरामसिंह का कहना है कि गाँव के बाहर बने दूसरे तालाब तक पहुँचने में ग्रामीणों को आसानी नही होती और इस तालाब का गाँववालों के लिए कोई उपयोग भी नही है। हैरत की बात है कि इतनी बड़ी आबादी के बीच गाँव के बच्चों के खेलने का कोई पार्क नही है।

बात साफ-सफाई की करें तो शौचालयों की तादात सरकारी आंकड़ो में भले ही आसमान छूती हो, लेकिन केवल 10 फीसदी घर ही ऐसे है जहाँ के लोग अपने शौचालयों में शौच के लिए जाते है। बाकी लोगो के शौचालय या तो कागजों में बने है या फिर सरकारी योजनाऐं उन लोगो के घरों तक पहुँची है नही। स्कूलों में बने शौचालय भी या तो टूटे है या फिर बंद रहते है। ग्रामप्रधान श्रीमती रेनूसिंह बताती है कि आबादी के लिहाज से इस गाँव को कम से कम पाँच सौ शौचालयों की आवश्यकता है।

स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव

गाँव के दूर-दूर तक कोई भी अस्पताल नही है। इस गाँव के लोग आपातकाल में केवल झोलाछाप डाक्टरों के सहारे रहते है। आमतौर पर गाँववाले इलाज के लिए अनूपशहर, डिबाई या फिर जिला मुख्यालय जाते है। स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के कारण इस गाँव के बच्चों को स्वास्थ्य स्वस्थ बच्चों जैसा नही है। समय से इलाज न मिल पाने की वजह से बड़े-बुजुर्गों को परेशानियां बनी रहती है। महिलाओं के प्रसव के लिए एकमात्र सहारा 42 किलोमीटर दूर जिला महिला अस्पताल है।

राशन व्यवस्था में भ्रष्टाचार

गाँव की एकमात्र राशनडीलर जानकी देवी है। वह खुद महिला है और उनका काम उनके परिवार के लोग देखते है इसलिए राशन से जुड़ी समस्याओं की भरमार है। ग्रामीण कल्याणसिंह बताते है कि बीपीएल कार्डधारकों का अनाज छोड़ दिया जाये तो केरोसिन से लेकर गेहूँ, चावल किसी भी ग्रामीण को नियमित नही मिलता। राशन डीलर ने गाँववालों के राशनकार्ड जमा कर रखे है। इसलिए ये भी पता नही चलता कि उसने कागजों पर किसे राशन दिया और हकीकत में कौन राशन ले गया।

सरकारी योजनाओं की हकीकत

सरकारी पैंशन योजनाओं की बात करें तो करीब आधे पात्रों को ही पैंशन मयस्सर है। ग्रामीण पवन का कहना है कि बाकी आधे ग्रामप्रधान से लेकर ब्लाक के अफसर और जिलाधिकारी के कार्यालयों पर अपनी अर्जियां लिए खड़े रहते है। ग्रामप्रधान रेनूसिंह का कहना है कि सरकारी विभागों को भेजी गयी अर्जियों पर काम नही होता। काफी प्रयासों के बाद उन्होने गाँव के कई लोगों की पैंशन दिलाई है। लेकिन सरकारी मानक बहुत कम है और पात्र बहुत ज्यादा।

सरकार की आवासीय योजनाओं में इंदिरा आवास योजना के तहत बीते चार सालों में केवल 4 आवास ही आवंटित किये गये है। गाँव में गरीब और बेघरों की संख्या 50 से ज्यादा है जाहिर है इतने लोग अभी भी पात्र बाकी बचे है। देखना होगा कि उनको यह लाभ कम मिल पाता है।

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