किसकी लगी बददुआ? डीपी समेत पूरा कुनबा सलाखों के पीछे

गाँव की गलियों में दूध बेचने से लेकर पश्चिमी उत्तरप्रदेश के माफिया डॉन बनने का सफर डीपी यादव के लिए एक चमत्कार जैसा रहा। गाजियाबाद के सर्फाबाद गाँव में डीपी ने गरीबी देखी, किसान परिवार में दूधिया बनकर धंधा शुरू किया और किसी बॉलीबुड फिल्म की कहानी के किरदार की तरह अपराध की दुनियां में एंट्री मारी।

गाजियाबाद और आसपास के जिलों के गुन्डों पर डीपी का रूतबा उनके सिर चढ़कर बोलता था। अपराध की काली दौलत को शराब के बिजनैस में सफेद करने के साथ डीपी सियासत में भी दाखिल हुए और यहाँ भी उन्होने ब्लाक प्रमुख से लेकर देश की संसद तक दस्तक दी। लेकिन जब डीपी का सितारा जमीदोंज हुआ तो देश की राजनीति के उन बड़े नामों ने उससे हाथ खींच लिये जो कभी डीपी की इसी खूबी पर फिदा हुआ करते थे।

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दूधिये से माफिया डॉन बनने तक का सफर

धरमपाल यादव उर्फ डीपी…। डीपी यादव पहले घर में पैदा होने वाला दूध बेचा करता था और फिर उसने गाजियाबाद के सर्फाबाद में एक डेयरी खोल ली। इसी डेयरी में बैठकर डीपी ने जरायम की दुनियां की एबीसी सीखी और फिर इलाके के दबंग और गुंडे के तौर पर उसकी पहचान होने लगी। डीपी के खिलाफ 1979 में पहला मामला कविनगर थाने में दर्ज हुआ।

अगले दस सालों में डीपी के खिलाफ दिल्ली, नोयडा, गाजियाबाद, बुलंदशहर बदायूँ और हरियाणा के कई जिलों में दर्जनों मामले दर्ज हुए। ये मामले हत्या, जानलेवा हमला, हत्या की साजिश, रंगदारी और करोड़ो की प्रापर्टी पर अवैध कब्जों जसे संगीन गुनाहों के थे। जैसे-जैसे डीपी का क्रिमिनल ग्राफ बढ़ा, राजनीति के आसमान पर डीपी का रंग जमने लगा।

सियासत के आसमां में डीपी की ऊँची उड़ान

उन दिनों जनता दल के नेता ऐसे किरदारों की तलाश में थे। डीपी में उन्हें ऐसा नेता नजर आया तो अपराध की दुनियां का बादशाह होने के साथ बेशुमार दौलत का मालिक था। मुलायमसिंह यादव ने डीपी को 1989 में पहली बार बुलंदशहर से विधानसभा का टिकट दिया। डीपी जीते और उनका कद और बढ़ता गया।

लेकिन सियासत की बुलंदियों के साथ डीपी और अपराध का नाता बना रहा। डीपी मुलायम की पहली सरकार में ताकतवर मंत्री बने। लेकिन दो साल बाद कल्याणसिंह की सरकार में उन्हें रासुका के तहत जेल जाना पड़ा। इसके बाद महेन्द्र भाटी की हत्या के मामले में भी वह आरोपी बने।

इस दौरान विधानसभा से लेकर संसद तक का रास्ता डीपी ने कई सियासी पार्टियों के सहारे तय किया। 2004 में डीपी ने भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा, लेकिन एनडीए के विरोध पर बीजेपी ने उनका लोकसभा टिकट वापस लेकर उन्हें भाजपा से निकाल दिया। 2007 में डीपी यादव और उनकी पत्नी राष्ट्रीय परिवर्तन दल के बैनर तले विधानसभा का इलैक्शन लड़े और दोनो जीते भी। 2009 में बसपा सुप्रीमो मायावती ने डीपी को अपनी पार्टी में शरण दे दी और डीपी के राष्ट्रीय परिवर्तन दल का बसपा में विलय हो गया। 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले डीपी समाजवादी पार्टी में एंट्री करना चाहते थे, लेकिन बीएसपी छोड़ने के बाद भी उन्हें अखिलेश यादव के विरोध के चलते सपा में आमद नही मिली।

बेटे के गुनाह से जमीदोंज हुआ जरायम और सियासत का सितारा

नीतिश कटारा हत्याकांड डीपी की जिंदगी का टर्निंग प्वाइन्ट बन गया। बताया जाता है कि नितीश कटारा और डीपी की बेटी भारती एक दूसरे को चाहते थे और शादी भी करना चाहते थे। लेकिन इससे पहले की बात बड़ो तक पहुँचती, डीपी के बिगड़ैल बेटे विकास यादव ने भारती और नीतिश को गाजियाबाद में आयोजित एक समारोह में बेहद करीब देखा।

इसके बाद नीतिश को अगवा करके खुर्जा इलाके में उसकी हत्या कर दी गयी। दो दिन बाद नीतिश की अधजली लाश के टुकड़े पुलिस ने बरामद किये। पुलिस तफ्तीश में विकास यादव, विशाल यादव और सुखदेव पहलवान को आरोपी बनाया गया। 30 मई 2008 को विशाल, विकास और सुखदेव पहलवान को अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई।

अब तक डीपी का बेटा विकास यादव नीतिश कटारा मर्डर केस में जेल की सलाखों के पीछे सजा काट रहा है। महेन्द्र भाटी की हत्या के मामले में डीपी के जेल की सलाखों के पीछे पहुँचने के बाद अब उनका सियासी जीवन विराम पर आ गया है।

आखिर क्यों हुई डीपी को उम्रकैद

शराब के कारोबार और अपराध की दुनियां में बेशुमार दौलत कमाने के बाद डीपी यादव ने अपना चोला पाक करने के लिए सियासत का दामन थामा। दादरी के विधायक और जनतादल में वीपी सिंह के बेहद खास महेन्द्र भाटी डीपी यादव के सियासी गुरू थे। महेन्द्र भाटी की कृपा से डीपी पहली बार 1980 में बिसरख के ब्लाक प्रमुख बने और राजनीति में अपनी जगह पक्की कर ली। 1989 में महेन्द्र भाटी ने ही डीपी को बुलंदशहर से विधायकी लड़ने के लिए जनता दल का टिकट दिलाया था। डीपी ने चुनाव लड़ा और अपने बाहुबल और जनतादल की सियासी हवा की बदौलत चुनाव जीतने में कामयाब रहे।

लेकिन तभी जनतादल से चन्द्रशेखर और मुलायम का धड़ा अलग हो गया। चन्द्रशेखर और मुलायम ने समाजवादी जनता पार्टी के नाम से अलग पार्टी बना ली। बस इसी साल डीपी और महेन्द्र भाटी के बीच के संबध बिगड़ने लगे। डीपी मुलायम का साथ पाकर प्रदेश की पहली मुलायम सरकार में पंचायत राज मंत्री बन गये और उनका रूतबा महेन्द्र भाटी की आंखों में खटकने लगा। लेकिन 1991 में हुए चुनाव के दौरान महेन्द्र भाटी ने डीपी को धूल चटाने के लिए अपने चेले प्रकाश पहलवान को बुलंदशहर से जनतादल का टिकट दिलवा दिया। प्रकाश पहलवान डीपी के सामने चुनाव लड़े, लेकिन चुनाव में दोनो दुश्मनों के बीच हुई हिंसा के चलते चुनाव पोसपोंड कर दिया गया।

डीपी की महेन्द्र भाटी से ठन गयी और उन्होने महेन्द्र भाटी को अपने सियासी रास्ते से हटाने के लिए साजिश रची। 13 सिंतबर 1992 को महेन्द्र भाटी जब भंगेल रेलवे क्रांसिंग पर बैरियर उठने का इंतजार कर रहे थे तभी कार सवार बदमाशों ने उन पर ताबड़तोड़ गोलियां चलायी। महेन्द्र भाटी के कई गोलियां लगी और मौके पर ही उनकी मौत हो गयी।

23 साल लंबे चले इस मुकदमें में 10 मार्च 2015 को फैसला आया और डीपी यादव को उम्र कैद की सजा सुनाई गयी है। डीपी यादव का बेटा विकास यादव पहले से ही नीतीश कटारा की हत्या के मामले में जेल में है और हाल ही में बुलंदशहर में हुए राजकुमार हब्बू मर्डर केस में डीपी के भांजा मनोज यादव फरारी काट रहा है। मनोज बुलंदशहर में डीपी यादव का शराब, सूद और प्रापर्टी का कारोबार देखता है।

(नरेन्द्र की रिपोर्ट)

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